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बोकारो से पहले दुमका में हुआ था 1.42 करोड़ का घोटाला, लेखापाल व कंप्युटर ऑपरेटर अब भी जेल में पर नहीं मिली राशि,

दुमका। बोकारो में सामने आए 3.15 करोड़ के अवैध निकासी मामले से चार साल पहले ही दुमका में ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल के तहत 1.42 करोड़ रुपये के गबन का मामला उजागर हो चुका था, लेकिन इस प्रकरण से न तो प्रशासन ने कोई ठोस सबक लिया और न ही सिस्टम में सुधार किया गया। परिणामस्वरूप वही तरीका बाद के वर्षों में अन्य जिलों में भी दोहराया गया, जिससे यह संकेत मिलता है कि वित्तीय निगरानी तंत्र में गंभीर खामियां लंबे समय से बनी हुई हैं।

निचले कर्मियों तक सिमटी कार्रवाई, मुख्य आरोपी अब भी दूर

दुमका। इस मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद कार्रवाई मुख्य रूप से निचले स्तर के कर्मियों तक सीमित रही। बिलिंग क्लर्क पंकज कुमार वर्मा और कंप्यूटर ऑपरेटर राजेश कुमार अब भी जेल में हैं, जबकि पवन कुमार गुप्ता जमानत पर बाहर है। जिन बैंक खातों में गबन की राशि ट्रांसफर की गई, उनके संचालकों तक पुलिस अब तक नहीं पहुंच सकी है और न ही एक रुपये की रिकवरी हो पाई है, जिससे जांच की दिशा और गंभीरता पर सवाल उठते हैं।

सुनियोजित साजिश के संकेत, सिस्टम की भूमिका पर सवाल

दुमका। विशेषज्ञों की मानें तो यह केवल एक मामला नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र की ओर इशारा करता है, जिसमें कई स्तरों पर मिलीभगत संभव है। कोषागार से राशि का गलत खाते में ट्रांसफर होना और अगले ही दिन उसकी निकासी हो जाना यह बताता है कि प्रक्रिया में कहीं न कहीं जानबूझकर लापरवाही या साजिश हुई है। इसके बावजूद मुख्य लाभार्थियों का गिरफ्तारी से बाहर रहना पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।

वित्त विभाग के निर्देश, लेकिन अनुपालन पर संशय

दुमका। वित्त विभाग द्वारा जारी हालिया निर्देश इस बात की पुष्टि करते हैं कि अवैध निकासी के मामलों में कई तकनीकी और प्रशासनिक कमियां रही हैं। बिना सेवा पुस्तिका सत्यापन के भुगतान, एक ही मोबाइल नंबर पर ओटीपी साझा करना, और वर्षों तक एक ही स्थान पर कर्मियों का जमे रहना जैसे कारण इन घोटालों की जड़ बने। सरकार ने तीन साल से अधिक समय से पदस्थापित बिलिंग क्लर्कों को हटाने और प्रक्रिया को सख्त करने का निर्देश दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके पालन को लेकर अब भी संदेह बना हुआ है।

चार साल बाद भी अधूरी जांच, जवाबदेही तय नहीं

दुमका। चार साल बाद भी दुमका गबन कांड में न तो पूरी सच्चाई सामने आ सकी है और न ही जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय हो पाई है। इससे आम लोगों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि बड़े आर्थिक अपराधों में वास्तविक दोषियों तक कानून की पहुंच नहीं हो पाती। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई और पारदर्शी जांच नहीं हुई, तो इस तरह के घोटाले भविष्य में भी सामने आते रहेंगे और सरकारी योजनाओं व जनता के भरोसे पर इसका सीधा असर पड़ेगा।


 
 
 

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