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पूर्व विधायक की बहू और पोता मजदूरी को मजबूर, विकास के दावों पर उठे सवाल

राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी स्वतंत्रता सेनानी के परिवार की दयनीय स्थिति

दुमका। झारखंड अलग राज्य बने 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। राज्य में विकास को लेकर उत्सव और जयंती समारोह तो धूमधाम से मनाए गए, लेकिन जमीनी सच्चाई कई स्थानों पर आज भी अलग तस्वीर पेश करती है। दुमका के काठीकुंड प्रखंड के तिलायटांड गांव में रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी और अखंड बिहार के पूर्व विधायक चडरा मुर्मू उर्फ चंदा मुर्मू के परिवार की वर्तमान परिस्थिति यह बताने के लिए काफी है कि कुछ परिवार आज भी सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं। उनकी पुत्रवधू लुखी हेम्बरम और पोता अनिकेत मुर्मू आज मजदूरी कर जीवनयापन करने को मजबूर हैं।

1969 में शिकारीपाड़ा से बने थे निर्दलीय विधायक

स्वतंत्रता सेनानी चडरा मुर्मू ने 1969 में शिकारीपाड़ा विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस उम्मीदवार बरियार हेम्बरम को हराकर विजय हासिल की थी। पुत्रवधू लुखी हेम्बरम बताती हैं कि उनके ससुर गांधीवादी विचारधारा के थे और उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में स्वतंत्रता सेनानी मोतीलाल केजरीवाल के साथ मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी योगदान के लिए 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया था।

265.50 रुपये की पेंशन में चलता था परिवार

परिवार की आर्थिक स्थिति वर्षों से बेहद कमजोर रही। लुखी हेम्बरम बताती हैं कि उनके ससुर के निधन के बाद उनकी सास ताला हांसदा को प्रतिमाह केवल 265.50 रुपये पारिवारिक पेंशन मिलता था, जिससे परिवार का खर्च चलाना बेहद कठिन था। 2013 में सास के निधन और 2017 में पति दीबू मुर्मू के गुजर जाने के बाद परिवार की हालत और भी खराब हो गई। लुखी दूसरे के घरों में मजदूरी कर किसी तरह बेटे की पढ़ाई और घर का खर्च चला रही हैं।

बीएड की डिग्री के बावजूद पोता बेरोजगार

लुखी हेम्बरम ने बताया कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने बेटे अनिकेत मुर्मू को पढ़ाया और 2024 में उसे बीएड की डिग्री दिला दी। इसके बावजूद सरकारी नीतियों और भर्ती प्रक्रिया में देरी के चलते वह आज भी बेरोजगार है और नौकरी की तलाश में भटक रहा है।

सरकारी योजनाओं से वंचित है परिवार

पूर्व विधायक के परिवार को आज तक कई प्रमुख सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका है। लुखी हेम्बरम का कहना है कि उन्हें न अबुआ आवास योजना के तहत घर मिला है, न विधवा पेंशन, और न ही मुख्यमंत्री मइया (बेटी) सम्मान योजना का लाभ। पूरे परिवार को सिर्फ जनवितरण प्रणाली के तहत चावल मिल रहा है, जबकि बाकी योजनाओं से वे पूरी तरह वंचित हैं।


 
 
 

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