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दुमका के गोपीकांदर में मरा द्वार की रहस्यमयी गूंजर, तीन दिनों में मौत की आहट!

दुमका। गोपीकांदर प्रखंड का कुंडापहाड़ी गांव एक ऐसे रहस्य से घिरा है, जिसमें दहशत भी है और अनसुलझी पहेली भी। गांव में मौजूद पहाड़ की ऊपरी चोटी पर स्थित गुफा—जिसे स्थानीय लोग “मरा द्वार” कहते हैं—आज भी अजीब आवाजों के कारण लोगों की चर्चा और भय का केंद्र बनी हुई है। ग्रामीणों का दावा है कि मरा द्वार से आवाज आती है, तो तीन दिनों के भीतर किसी व्यक्ति की मौत होना तय है।

गुफा की रहस्यमयी आवाज, जो बन जाती है मौत का संकेत

कुंडापहाड़ी की इस गुफा से दरवाजा खुलने और बंद होने जैसी तेज आवाजें निकलती हैं, जो लगभग दो से तीन किलोमीटर दूर स्थित पहाड़िया टोला तक साफ सुनाई देती हैं। ग्रामीण कहते हैं कि यह आवाज शुभ नहीं होती। आवाज सुनते ही लोग समझ जाते हैं कि आने वाले दिनों में किसी की मृत्यु अवश्य होने वाली है। यह अंधविश्वास है या किसी प्राकृतिक घटना का संकेत? कोई नहीं जानता, लेकिन ग्रामीणों का विश्वास आज भी अटल है।

संवाददाता की रोमांचक यात्रा मरा द्वार तक

मामले की सच्चाई जानने के लिए संवाददाता नितेश कुमार खुद कुंडापहाड़ी पहुंचे। ग्रामीणों के साथ पैदल पहाड़ चढ़ते हुए वे गुफा की चोटी तक पहुँचे। रास्ता बेहद ऊबड़-खाबड़ था, जगह-जगह झाड़ियाँ काटकर आगे बढ़ना पड़ा। कई जगह पर पहाड़ियों की खेती—अरहर, बरबट्टी और बाजार—भी नजर आई। यह सफर जितना दिलचस्प था, उतना ही रोमांच से भरा।

गुफा के बंद द्वार ने बढ़ाया रहस्य: मशीन कटिंग जैसे पत्थर!

गुफा का द्वार अब वर्षों से बंद है। ग्रामीण बताते हैं कि एक पुराने भूकंप में इसका मुंह पूरी तरह चट्टानों से ढक गया। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य यह है कि द्वार पर मौजूद बड़े-बड़े पत्थरों में मशीन से कटिंग जैसा निशान दिखता है—जैसे किसी ने छेनी-हथौड़े से नहीं, बल्कि आधुनिक मशीन से इन्हें गढ़ा हो। सवाल उठता है कि पहाड़ की ऊपरी चोटी पर मशीनें आखिर पहुंचीं कैसे? या यह कोई प्राचीन संरचना है?

मरा द्वार से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताएँ

स्थानीय निवासी दिनेश्वर देहरी बताते हैं कि पहाड़िया समुदाय के पूर्वज इसी पहाड़ पर रहते थे और इस गुफा में पूजा-पाठ तथा बलि प्रथा प्रचलित थी। बलि देने की परंपरा अब बंद हो चुकी है, लेकिन पूर्वजों की कथाएँ आज भी जीवित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मरा द्वार की ओर बिना अनुमति या बिना “सकुशल वापस लौटने” का प्रण लिए जाने पर अनहोनी की आशंका रहती है। कई लोगों ने दावा किया कि वहाँ पहुँचने पर विचित्र जानवर भी दिखाई देते हैं।

हवा में घुला डर, फिर भी आगे बढ़ते ग्रामीण

संवाददाता के साथ ग्रामीणों की एक टोली, जिसमें महिलाएँ, पुरुष और बच्चे शामिल थे, साहस जुटाकर पहाड़ की ओर रवाना हुई। रास्ते में ऊंचाई बढ़ने के साथ डर और उत्सुकता, दोनों बढ़ती गई। कई जगह ग्रामीणों ने भोजन बनाने की व्यवस्था की, जबकि कुछ लोग मरा द्वार देखने की हिम्मत कर आगे बढ़ते रहे। अंततः पूरी टीम घंटों की थकान के बाद गुफा के बंद द्वार तक पहुँच ही गई।


रहस्य जस का तस—क्या आवाजें प्राकृतिक हैं या परलोक का संकेत?

मरा द्वार आज भी रहस्य का बड़ा सवाल है। आवाजें आती क्यों हैं? ये किसके आने की आहट हैं—प्रकृति की, किसी प्राचीन संरचना की, या किसी ऐसी शक्ति की जिसे विज्ञान अभी तक समझ नहीं पाया? ग्रामीणों का दावा है कि “आवाज़ का मतलब है मौत”—और यही बात इस जगह को और भी डरावना और रहस्यमय बनाती है।

 
 
 

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