आदिवासी युवती दुष्कर्म-हत्या केस: ढाई साल बाद भी सुनवाई सुस्त, 12 से अधिक गवाह, गवाही महज 2 की!

न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार पर उठ रहे सवाल
दुमका। दुष्कर्म और हत्या जैसी संगीन वारदातों के बाद आम तौर पर जनता की दो प्रमुख मांगें उठती हैं—आरोपियों को कठोर सजा और मुकदमे का त्वरित निष्पादन। इसके साथ ही पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता देने की मांग भी की जाती है। काठीकुंड में हाल में हुई नाबालिग छात्रा की दुष्कर्म के बाद हत्या की घटना में पीड़ित परिवार को 5 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा दिया गया। वहीं, जामा थाना क्षेत्र में 1 मई 2024 को हुई 21 वर्षीय आदिवासी युवती की मौत के मामले में आरोपी की गिरफ्तारी और आरोपपत्र दाखिल होने के बावजूद सुनवाई की धीमी रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अभियोजन पक्ष के एक दर्जन से अधिक गवाहों में से अब तक महज 2 की गवाही हुई है। परिवार को मुआवजा नहीं मिलने की बात भी सामने आई है। ऐसे में आदिवासी संगठनों की ओर से पुलिस और प्रशासन की कार्यशैली पर उठाए जा रहे सवालों के बीच इस मामले में जवाबदेही तय करने की मांग तेज हो सकती है।

शादी के विवाद के बाद हत्या का आरोप
प्राथमिकी और पुलिस के आरोपपत्र के अनुसार, युवती का बाबूजन मुर्मू के साथ प्रेम संबंध था और वह उससे शादी करना चाहती थी। आरोप है कि शादी का झांसा देकर उसका यौन शोषण किया गया। जब युवती ने आरोपी के साथ उसके घर जाने की जिद की, तो विवाद हुआ और कथित तौर पर गला दबाकर उसकी हत्या कर दी गई। इसके बाद घटना को आत्महत्या का रूप देने के लिए शव को दुपट्टे के सहारे जंगल में पलास के पेड़ से लटका दिया गया। 2 मई 2024 को रांगा-गोराचातर जंगल में युवती का शव बरामद हुआ था। हालांकि, मामले में अंतिम दोष सिद्धि न्यायालय में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगी।

पोस्टमार्टम में दम घुटने से मौत का उल्लेख
अभिलेख के अनुसार, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर मृत्यु से पहले बने लिगेचर मार्क का उल्लेख है और मौत का कारण दम घुटना बताया गया है। जांच के दौरान अंतर्वस्त्र, रक्त लगे गॉज, नाखूनों के नमूने और अन्य जैविक साक्ष्य सुरक्षित किए गए। योनि स्वाब की जांच में शुक्राणु नहीं पाए जाने की बात दर्ज है, लेकिन इससे अपने आप में यौन हिंसा के आरोप की पुष्टि या खंडन नहीं होता। पुलिस अभिलेख में जब्त प्रदर्शों को विधि-विज्ञान प्रयोगशाला भेजने और वैज्ञानिक जांच कराने की प्रक्रिया का भी उल्लेख है। ऐसे मामले में चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों को न्यायालय के समक्ष समय पर प्रस्तुत करना अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण है।

दुमका के जियो मार्ट से गिरफ्तार हुआ था आरोपी
जामा थाना कांड संख्या 40/2024 में पुलिस ने बाबूजन मुर्मू को 2 मई 2024 को दुमका के गांधी मैदान के पास स्थित जियो मार्ट से गिरफ्तार किया था। वह वहां सफाई का काम करता था और 3 मई को उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस ने 28 जून 2024 को आरोपपत्र संख्या 49 भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 201 और 376(2) के तहत दाखिल किया। आरोपपत्र में पुलिस के समक्ष आरोपी के कथित स्वीकारोक्ति बयान का भी उल्लेख है। हालांकि, पुलिस के समक्ष दिया गया स्वीकारोक्ति बयान अपने आप में दोष सिद्ध करने का अंतिम प्रमाण नहीं होता। अभियोजन को न्यायालय में गवाहों, चिकित्सकीय रिपोर्ट और अन्य स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर आरोप साबित करना होगा। आरोपपत्र दाखिल होने के बाद मुकदमे की सुनवाई किस गति से आगे बढ़ी, यही अब प्रमुख सवाल है।

एक दर्जन से अधिक गवाह, अब तक महज 2 की गवाही
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मामले में बाबुशल बेसरा, दिनेश कुमार टुडू, नींबू लाल बेसरा, रामेश्वर मुर्मू, छोटू बेसरा, बसंती बेसरा, सुष्मिता हांसदा, सोमलाल टुडू तथा रिलायंस स्मार्ट मॉल के कर्मचारी संतोष शर्मा और लखीकांत पंजियारा सहित अनुसंधानकर्ता और चिकित्सक गवाहों की सूची में शामिल हैं। बताया जा रहा है कि ढाई साल से अधिक समय बीतने के बावजूद इनमें से केवल 2 गवाहों का न्यायालय में परीक्षण हुआ है। यदि यह आंकड़ा सही है, तो इतने गंभीर अपराध के मुकदमे में गवाही की धीमी गति गंभीर चिंता का विषय है। यह स्पष्ट होना चाहिए कि शेष गवाहों की गवाही अब तक क्यों नहीं हो सकी और उन्हें न्यायालय में पेश करने में क्या बाधाएं आ रही हैं।

काठीकुंड में मुआवजा, जामा मामले में परिवार की स्थिति पर सवाल
काठीकुंड की हालिया घटना में पीड़ित परिवार को 5 लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा दिए जाने के बाद जामा के इस मामले में भी आर्थिक सहायता की स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, परिवार को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। हालांकि, दोनों मामलों की परिस्थितियां और प्रशासनिक प्रक्रियाएं अलग हो सकती हैं, फिर भी पीड़ित परिवार को सहायता देने में हुई देरी पर प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। मुआवजा आर्थिक संबल दे सकता है, लेकिन वह निष्पक्ष सुनवाई और समय पर न्याय का विकल्प नहीं है। पुलिस, अभियोजन और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि पीड़ित परिवार को सरकारी सहायता तथा न्यायिक प्रक्रिया की प्रगति के बारे में स्पष्ट जानकारी मिले।

न्याय में देरी पर जवाबदेही तय करने की मांग
मौत के मामले में आरोपी की गिरफ्तारी और आरोपपत्र दाखिल होने के बाद अब सुनवाई की गति पर ध्यान देना जरूरी है। आदिवासी संगठनों की ओर से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि आदिवासी पीड़ितों से जुड़े मामलों में पुलिस और प्रशासन अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाते। इस मामले में आरोप की स्वतंत्र जांच और तथ्यों के आधार पर समीक्षा जरूरी है; केवल गवाही में देरी से भेदभाव का निष्कर्ष अपने आप नहीं निकाला जा सकता। फिर भी, यदि ढाई साल से अधिक समय में केवल 2 गवाहों की गवाही हुई है, तो संबंधित अधिकारियों को देरी के कारण स्पष्ट करने चाहिए। यह भी बताया जाना चाहिए कि कितने गवाहों की गवाही बाकी है, वैज्ञानिक जांच की क्या स्थिति है और मुकदमे को समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता के साथ निष्पक्ष सुनवाई और समय पर न्याय मिलना भी जरूरी है, क्योंकि न्याय में देरी को अक्सर न्याय से वंचित होने के समान माना जाता है।





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