पुलिस ने माना आदिवासी महिला की गला दबाकर हुई हत्या, हत्यारे को पकड़ा नहीं, बंद कर दिया केस

पुलिस ने कहा- निकट भविष्य में भी अपराधी का पता चलने की संभावना नहीं
दुमका। काठीकुंड की नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने के बीच रामगढ़ थाना क्षेत्र में 60 वर्षीय आदिवासी महिला फूल बेसरा की हत्या का मामला भी पुलिस अनुसंधान की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 23 मई 2023 को दर्ज रामगढ़ थाना कांड संख्या 47/2023 में पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने महिला की मौत हाथ से गला दबाने के कारण होने और मृत्यु की प्रकृति हत्या होने की पुष्टि की थी। इसके बावजूद करीब 3 साल तक चले अनुसंधान में पुलिस किसी आरोपी की पहचान या गिरफ्तारी नहीं कर सकी। अंततः 27 जून 2026 को न्यायालय में क्लोजर रिपोर्ट समर्पित कर दी गई। रिपोर्ट में कहा गया कि हत्या का आरोप सही है, लेकिन अपराधी का पता नहीं चल सका और निकट भविष्य में भी उसके पता चलने की संभावना नहीं है। इस मामले ने सवाल खड़ा कर दिया है कि हत्या की पुष्टि होने के बाद भी पुलिस हत्यारे तक क्यों नहीं पहुंच सकी।

पोस्टमार्टम में गर्दन पर चोट और खरोंच के कई निशान
पुलिस की केस डायरी और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, फूल बेसरा के शरीर पर गर्दन के आसपास चोट और खरोंच सहित कई निशान पाए गए थे। चिकित्सकीय रिपोर्ट में मौत का कारण हाथ से गला दबाना बताया गया और मृत्यु को हत्या की प्रकृति का माना गया। मृतका के भाई सुखलाल बेसरा ने शिकायत में अज्ञात व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा हत्या किए जाने की आशंका जताई थी। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और ग्रामीणों के बयान भी दर्ज किए। इसके बावजूद अंतिम रिपोर्ट में किसी अपराधी की पहचान नहीं होने की बात कही गई। उपलब्ध अभिलेखों में हत्या के पीछे के संभावित कारण और संदिग्धों तक पहुंचने के लिए किए गए ठोस प्रयासों का स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आता। ऐसे में अनुसंधान की दिशा और उसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

पर्यवेक्षण में दिए गए निर्देशों का क्या हुआ?
मामले की केस डायरी में 20 जनवरी 2024 की पर्यवेक्षण टिप्पणी दर्ज है। इसमें मृतका की अंतिम चिकित्सकीय रिपोर्ट प्राप्त करने, अज्ञात अपराधियों की पहचान और गिरफ्तारी के प्रयास करने, मृतका के मोबाइल फोन तथा कॉल विवरण की जांच करने और घटना के कारणों को स्पष्ट करने का निर्देश दिया गया था। मृतका के किसी अन्य व्यक्ति से संबंध होने की संभावना की भी पड़ताल करने को कहा गया था। लेकिन 27 जून 2026 को अंतिम रिपोर्ट दाखिल होने तक इन सभी बिंदुओं पर क्या कार्रवाई हुई, मोबाइल फोन या कॉल विवरण से कोई सुराग मिला या नहीं और संभावित संदिग्धों की गतिविधियों का कितना सत्यापन किया गया, इसका स्पष्ट जवाब उपलब्ध अभिलेखों से नहीं मिलता। मृतका के परिचितों, उसके घर तक पहुंच रखने वाले व्यक्तियों और घटना से पहले तथा बाद की परिस्थितियों की जांच को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

गवाहों के बयान में समानता, कॉपी-पेस्ट से तैयार हुई केस डायरी?
गवाह रूपलाल बास्की, देवलाल बास्की और बाबुबेटा बास्की सहित अन्य ग्रामीणों के बयानों में कई अंश लगभग समान शब्दों में दर्ज हैं। इनमें सुबह महिला को मृत अवस्था में देखने, घर में अज्ञात व्यक्ति के घुसने और हत्या किए जाने की आशंका जैसी बातें मिलती-जुलती भाषा में लिखी गई हैं। किसी गवाह ने प्रत्यक्ष रूप से हत्या होते देखने की बात नहीं कही। बयानों में इस तरह की समानता से यह सवाल उठता है कि क्या प्रत्येक गवाह से अलग-अलग परिस्थितियों में स्वतंत्र और विस्तृत पूछताछ की गई थी या बयानों के कुछ हिस्से एक जैसे दर्ज कर दिए गए। हालांकि, केवल समान भाषा के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बयान कॉपी-पेस्ट किए गए हैं, लेकिन पुलिस अनुसंधान की गुणवत्ता की समीक्षा के लिए यह एक महत्वपूर्ण बिंदु जरूर है।

3 साल में गिरफ्तारी नहीं, क्लोजर रिपोर्ट में अनुसंधान बंद करने का उल्लेख
मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत दर्ज किया गया था। पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट में अज्ञात अपराधियों के खिलाफ हत्या का आरोप सही पाया, लेकिन किसी की पहचान नहीं कर सकी। 27 जून 2026 को समर्पित रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भविष्य में कोई सुराग मिलने पर वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सवाल यह है कि जब किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई थी, तो क्या आगे के अनुसंधान की संभावनाओं का पूरी तरह परीक्षण किया गया था? कानून में आरोपपत्र दाखिल करने की समयसीमा और जांच जारी रखने के प्रश्न अलग-अलग हैं; इसलिए केवल 60 या 90 दिन की समयसीमा के आधार पर क्लोजर रिपोर्ट को गलत नहीं कहा जा सकता। लेकिन हत्या की पुष्टि के बावजूद अपराधी की पहचान नहीं होना और महत्वपूर्ण जांच बिंदुओं पर स्पष्ट निष्कर्ष नहीं मिलना पुलिस की जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।

आदिवासी महिला की हत्या में पुलिस की भूमिका पर उठे सवाल
फूल बेसरा की हत्या का मामला केवल एक अनसुलझे अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि गंभीर अपराधों में अनुसंधान की गुणवत्ता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाती है। काठीकुंड की किशोरी की हत्या के मामले में भी पुलिस की कार्रवाई में देरी को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि, इन दोनों मामलों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि पुलिस जाति या समुदाय देखकर कार्रवाई करती है, लेकिन फूल बेसरा के मामले में लगभग 3 साल बाद भी हत्यारे की पहचान नहीं होना गंभीर समीक्षा की मांग करता है। क्या मोबाइल फोन और कॉल विवरण की जांच हुई? क्या संभावित संदिग्धों से पर्याप्त पूछताछ की गई? क्या पर्यवेक्षण में दिए गए निर्देशों का पालन हुआ? इन सवालों का जवाब पुलिस प्रशासन को देना चाहिए।

पुनः अनुसंधान के लिए न्यायालय जाने की तैयारी
मृतका के भाई सुखलाल बेसरा का कहना है कि वह अपने अधिवक्ता के माध्यम से न्यायालय में याचिका दाखिल कर मामले का पुनः अनुसंधान कराने की मांग करेंगे। इस संबंध में तैयार याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है। इसमें गवाहों के बयानों की नए सिरे से समीक्षा, मृतका के मोबाइल फोन और कॉल विवरण की जांच, घटनास्थल का पुनर्मूल्यांकन तथा उपलब्ध चिकित्सकीय, विधि-विज्ञान और तकनीकी साक्ष्यों को फिर से खंगालने की मांग शामिल है। याचिका में किसी विशेष व्यक्ति को बिना साक्ष्य दोषी ठहराने के बजाय निष्पक्ष और पूर्ण जांच पर जोर दिया गया है। अब देखना होगा कि न्यायालय इस मांग पर क्या निर्णय लेता है और फूल बेसरा के परिजनों को न्याय दिलाने के लिए आगे की जांच का रास्ता खुलता है या नहीं।





Comments