चुनाव लड़ने का सामाजिक मापदंड आखिर क्या हो ?
- SANTHAL PARGANA KHABAR
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दुमका की राजनीति इस समय एक निर्णायक दौर में है। दुमका विधानसभा और लोकसभा पहले से सुरक्षित सीटें रही हैं और नगर निकाय चुनाव में भी लगातार तीन बार अध्यक्ष पद महिला आरक्षित रहा। इस बार पहली बार यह पद समान वर्ग के लिए खुला है, जहां सभी जाति-धर्म के महिला-पुरुष चुनाव लड़ सकते हैं। यह बदलाव केवल व्यवस्था का नहीं, बल्कि दुमका के लोकतांत्रिक विवेक की कसौटी है।
मौका पहली बार, पर मापदंड क्या?
पुरुष उम्मीदवारों को पहली बार अध्यक्ष पद के लिए सीधा अवसर मिला है। सवाल यह नहीं कि चुनाव कौन लड़े, बल्कि यह है कि किस आधार पर लड़े।
क्या सिर्फ पुराना नाम, संसाधन और जातीय समीकरण काफी है, या फिर जनता अब नेतृत्व की नई परिभाषा तलाश रही है?

अमिता रक्षित : भरोसा, नाराज़गी और छूटा अवसर
अमिता रक्षित को दुमका की जनता दो बार नगर पालिका अध्यक्ष चुन चुकी है। यह भरोसे का बड़ा प्रमाण था। लेकिन पिछले चुनाव में उन्हें भारी नाराजगी का सामना करना पड़ा और निर्णायक हार मिली। हार के बाद उन्होंने अपने भारती हॉस्पिटल की जिम्मेदारी संभाली और बीते आठ वर्षों में एक सफल बिजनेस लेडी के रूप में पहचान बनाई।
अस्पताल के माध्यम से समाज सेवा का एक मजबूत मंच उनके पास था, लेकिन शहर में यह चर्चा आम है कि इस अवसर का उपयोग उस स्तर पर नहीं हो सका, जैसी अपेक्षा जनता को थी। यही कारण है कि आज उनका नाम अनुभव के साथ-साथ सवालों से भी जुड़ा है।

अजय झा उर्फ मिक्की झा : सहानुभूति से मिली जीत, अपेक्षाओं की कसौटी
पूर्व अध्यक्ष श्वेता झा के पति अजय झा उर्फ मिक्की झा का राजनीतिक सफर भी दुमका की राजनीति का अहम अध्याय है। लगातार दो चुनाव हारने के बाद, अमिता रक्षित के प्रति नाराजगी और उनसे सहानुभूति के माहौल में पिछला चुनाव उनकी पत्नी के पक्ष में गया।
लेकिन शहर के लोगों का कहना है कि जिन उम्मीदों के साथ उन्हें मौका दिया गया, वे अपेक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं। सहानुभूति से मिली जीत अगर काम में न बदले, तो अगला चुनाव सबसे कठिन हो जाता है—दुमका इसका गवाह है।

विनोद कुमार लाल : व्यवस्था से टकराने वाला चेहरा
पूर्व उपाध्यक्ष विनोद कुमार लाल नगर पालिका की व्यवस्था से लगातार संघर्ष करते रहे हैं। उपाध्यक्ष रहते हुए उन्हें अविश्वास प्रस्ताव तक का सामना करना पड़ा। उनके खिलाफ दो बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया पर दोनों बार अविश्वास प्रस्ताव औंधे मुंह गिर गया। पिछले चुनाव में वे झामुमो प्रत्याशी अभिषेक चौरसिया को बेहद नजदीकी मुकाबले में हराकर विजयी हुए थे।
उनकी राजनीति टकराव और सवाल उठाने की रही है, जिसने उन्हें एक जुझारू नेता की पहचान दी है। सवाल यह है कि यह संघर्ष शहर को किस दिशा में ले जाएगा।

अभिषेक चौरसिया : हार के बाद भी मैदान में
अभिषेक चौरसिया लगातार लोगों के संपर्क में रहे हैं। पिछली हार के बाद उन्होंने राजनीति से दूरी नहीं बनाई, बल्कि उसी दिन से अगली तैयारी शुरू कर दी। यही निरंतरता इस बार उनके दावे को मजबूत बनाती है।
दुमका में यह संदेश साफ है—जो हार के बाद भी जनता के बीच रहे, वही अगली बार गंभीर दावेदार बनता है।

सुमित पटवारी : समाज सेवा से राजनीति तक
युवा प्रत्याशी सुमित पटवारी गरीबों के बीच कंबल वितरण के जरिए चर्चा में आए। उन्होंने खुद को एक समाजसेवी के रूप में प्रस्तुत किया है और यह नगर पालिका का उनका पहला चुनाव है।
लेकिन जनता के बीच यह सवाल भी है कि क्या समाज सेवा चुनावी मौसम की रणनीति है या फिर यह जीवनभर की प्रतिबद्धता बनेगी।

राधेश्याम वर्मा और रंजीत जायसवाल : राजनीति को जीवन देने वाले लोग
राधेश्याम वर्मा और रंजीत जायसवाल जैसे प्रत्याशी ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी राजनीति और जन सरोकारों में लगा दी।
राधेश्याम वर्मा सिविल सोसाइटी और सदन एकता के माध्यम से लगातार जनता की समस्याएं उठाते रहे हैं। ऐसे लोग सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम मानते हैं। अगर ऐसे लोगों को मौका मिलता है, तो लोकतंत्र और मजबूत होता है।
युवा और आंदोलन : रवि शंकर मंडल का उदाहरण
विवेक भारती, अंकित गुप्ता और रवि शंकर मंडल जैसे नाम सामने हैं, लेकिन इनमें रवि शंकर मंडल ही ऐसे प्रत्याशी हैं जो लगातार रेलवे के खिलाफ आंदोलन करते रहे हैं और अब चुनावी मैदान में हैं।
यह बताता है कि आंदोलन, संघर्ष और मुद्दों से राजनीति में प्रवेश संभव है—सिर्फ धन या जाति से नहीं।
जाति नहीं, काम निर्णायक
दुमका की जनता पहले ही साबित कर चुकी है कि चुनाव केवल जातीय गणित से नहीं जीते जाते। पिछले नगर पालिका चुनाव में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष—दोनों पदों पर ऐसे लोग जीते जो ऊंची जाति से थे, जबकि उनका जातीय वोट बैंक सीमित था।
मतलब साफ है—जनता व्यक्ति देखती है, जाति नहीं।
यह चुनाव सिर्फ अमिता रक्षित, अजय झा, विनोद कुमार लाल, अभिषेक चौरसिया, सुमित पटवारी, राधेश्याम वर्मा या रंजीत जायसवाल के बीच मुकाबला नहीं है।
यह चुनाव इस बात का है कि दुमका किस तरह के नेतृत्व को स्वीकार करेगा—नाम और पहचान को या फिर संघर्ष, सेवा और दृष्टि को।








सेवा तो एक व्यक्ति करते आया और कर रहा है मिक्की झा