बेलबोरोन पूजा में गुरु-शिष्य परंपरा और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण पर जोर

दशांय नृत्य और गीत के माध्यम से किया ठाकुर एवं ठकरन का गुणगान
दुमका। दिसोम मरांग बुरु युग जाहेर अखड़ा की ओर से दुमका प्रखंड के लेटो गांव में संताल आदिवासियों का पारंपरिक धार्मिक पर्व बेलबोरोन पूजा आयोजित की गई। इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान के साथ दशांय नृत्य और गीत के माध्यम से ठाकुर एवं ठकरन का गुणगान किया गया। संताल समाज में इस पर्व को धार्मिक आस्था, गुरु-शिष्य परंपरा और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। पूजा में काहा मरांडी, सुनील टुडू, सुरय टुडू, जोहोन टुडू, झोमोल मरांडी, अल्बेनुस किस्कू, लुखिराम टुडू, फोनी टुडू, सोम किस्कू, साहब टुडू और पवन टुडू सहित अन्य लोग मौजूद थे।

ठाकुर और ठकरन से जुड़ी धार्मिक मान्यता:
संताल धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब पृथ्वी पर मनुष्यों के पाप बढ़ने लगे, तब ठाकुर ने मानव जाति को नष्ट करने का निर्णय लिया। मान्यता है कि ठाकुर ने 12 दिन और 12 रात तक सिंगबीर एवं मानबीर पर सेगेल दाह यानी अग्निबाण बरसाए तथा पुहह यानी जीवाणु-विषाणु के माध्यम से मनुष्यों को नष्ट करने की योजना बनाई। इसकी जानकारी मिलने पर ठकरन ने ठाकुर से मानव जाति को नष्ट नहीं करने का आग्रह किया। उन्होंने मनुष्यों को अपने बच्चे बताते हुए लिटह यानी मरांग बुरु के सहयोग से उन्हें धर्म के मार्ग पर वापस लाने की बात कही।

दशांय नृत्य और गीत से दिया जाता है धर्म का संदेश:
धार्मिक परंपरा के अनुसार, ठकरन ने लिटह को मोनचोपुरी यानी पृथ्वी लोक से शिरमापुरी यानी देवलोक बुलाकर मनुष्यों को धर्म के मार्ग पर लाने का संदेश दिया। इसी मान्यता से ठाकुर और ठकरन के वस्त्र एवं आभूषणों के प्रतीकों के साथ दशांय नृत्य और गीत के माध्यम से उनके गुणगान की परंपरा शुरू हुई। इसमें ठकरन के प्रतीक स्वरूप साड़ी, शंख, काजल और सुनुम-सिंदुर यानी तेल-सिंदूर, जबकि ठाकुर के प्रतीक स्वरूप लिपुर, पैगोन और मोरपंख आदि का उपयोग किया जाता है। इस अनुष्ठान के माध्यम से लोगों को अधर्म से दूर रहने और धार्मिक मूल्यों का पालन करने का संदेश दिया जाता है।

12 गुरु बोंगाओं की पूजा का विशेष महत्व:
संताल धार्मिक परंपरा में 12 गुरु बोंगाओं यानी गुरु देवताओं का विशेष महत्व है। इनमें धरोम गुरु बोंगा, कमरू गुरु बोंगा, भुवग गुरु बोंगा, कांशा गुरु बोंगा, चेमेय गुरु बोंगा, सिद्ध गुरु बोंगा, सिदो गुरु बोंगा, रोहोड़ गुरु बोंगा, गांडु गुरु बोंगा, भाइरो गुरु बोंगा, नरसिं गुरु बोंगा और भेन्डरा गुरु बोंगा शामिल हैं। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, इनका संबंध धर्म, रोग मुक्ति, नृत्य-संगीत और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से है। इनके माध्यम से धार्मिक ज्ञान, पारंपरिक चिकित्सा तथा औषधीय जड़ी-बूटियों की पहचान और उपयोग से संबंधित ज्ञान को आगे बढ़ाने की परंपरा रही है। मान्यता है कि ठकरन दशांय चांदु के छठे दिन गुरु बोंगाओं के साथ पृथ्वी लोक पर अवतरित होती हैं। इसी मान्यता के तहत शारदीय नवरात्र की षष्ठी तिथि को बेलबोरोन पूजा की जाती है।

गुरु-शिष्य परंपरा से संरक्षित होता है पारंपरिक ज्ञान:
बेलबोरोन पूजा से लगभग 1 सप्ताह पहले गुरु और शिष्य गांव के आखड़ा में एकत्र होकर अनुष्ठान की तैयारी करते हैं। इस दौरान गुरु अपने शिष्यों को पारंपरिक मंत्र-साधना, धार्मिक रीति-रिवाज और चिकित्सा पद्धतियों से संबंधित ज्ञान देते हैं। गुरु-शिष्य पहाड़ों तथा अन्य स्थानों पर जाकर औषधीय जड़ी-बूटियों की पहचान और विभिन्न बीमारियों में उनके पारंपरिक उपयोग के बारे में भी सीखते हैं। यह परंपरा धार्मिक अनुष्ठानों के साथ पारंपरिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

4 दिनों तक चलता है दशांय नृत्य और गीत का क्रम:
परंपरा के अनुसार, बेलबोरोन पूजा के दूसरे दिन से लगातार 3 दिनों तक गुरु-शिष्य गुरु बोंगाओं के प्रतीकों के साथ गांव-गांव भ्रमण करते हैं। इस दौरान दशांय नृत्य और गीत के माध्यम से ठाकुर एवं ठकरन का गुणगान किया जाता है तथा श्रद्धालुओं के घरों में सुख, शांति और समृद्धि की कामना के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के चौथे और अंतिम दिन अपने गांव में दशांय नृत्य एवं गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। बेलबोरोन पूजा संताल समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान, गुरु-शिष्य परंपरा और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान के संरक्षण का संदेश देती है।





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