साहित्यकार नीलोत्पल मृणाल के साथ उनके पुस्तक ‘विश्वगुरु’ पर साहित्यिक संवाद
- SANTHAL PARGANA KHABAR
- Jan 25
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दुमका। वन विश्राम गृह में युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित समकालीन कथाकार नीलोत्पल मृणाल के साथ आयोजित विशेष बुक बैठक एवं साहित्यिक संवाद कार्यक्रम में साहित्य, समाज और समकालीन यथार्थ पर गंभीर विमर्श हुआ। शांत प्राकृतिक वातावरण में आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्यप्रेमी पाठक, युवा लेखक, शिक्षाविद, शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बड़ी भागीदारी रही, जिससे यह आयोजन दुमका के साहित्यिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण चर्चा का केंद्र बन गया।

उपन्यास ‘विश्वगुरु’ के सामाजिक-राजनीतिक अर्थों पर तीखी बहस
दुमका। संवाद का मुख्य केंद्र नीलोत्पल मृणाल का बहुचर्चित उपन्यास ‘विश्वगुरु’ रहा, जिसमें कथा-वस्तु, सत्ता संरचना, सामाजिक यथार्थ और युवाओं व आम जनता के संघर्षों पर विस्तार से चर्चा हुई। लेखक ने स्पष्ट किया कि ‘विश्वगुरु’ उस दौर की कहानी है, जहां बड़े नारों और दावों के बीच आम आदमी व्यवस्था का बोझ उठाने को मजबूर है, और यही यथार्थ उपन्यास का मूल स्वर है।

कवर पेज से सत्ता तक: प्रतीकों की गहराई पर चर्चा
दुमका। कार्यक्रम में उपन्यास के कवर पेज पर विशेष चर्चा हुई, जिसमें बाघ द्वारा रथ खींचे जाने और रथ पर बैठे चार सियारों के प्रतीकात्मक दृश्य को लेकर सवाल उठे। नीलोत्पल मृणाल ने स्पष्ट किया कि यह दृश्य मात्र सजावट नहीं, बल्कि सत्ता, अवसरवाद और जनता के शोषण का गहन रूपक है, जो उपन्यास की वैचारिक आत्मा को अभिव्यक्त करता है।

एआई के दौर में साहित्य: संवेदना बनाम तकनीक
दुमका। संवाद के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में साहित्य लेखन की चुनौतियों पर भी गंभीर चर्चा हुई। नीलोत्पल मृणाल ने कहा कि तकनीक लेखन को प्रभावित कर सकती है, लेकिन मानवीय संवेदना, अनुभव और नैतिक प्रश्नों का स्थान कोई तकनीक नहीं ले सकती। उन्होंने जोर दिया कि लेखक के लिए केवल लिखना ही नहीं, बल्कि पाठक को विचारशील बनाना और समाज से जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती है।

कालजयी साहित्य का सूत्र: जिम्मेदारी, अध्ययन और सत्य
दुमका। लेखक ने कहा कि जो साहित्य अपने समय की सच्चाइयों से टकराने का साहस रखता है और सत्ता या लोकप्रियता के दबाव में समझौता नहीं करता, वही कालजयी बनता है। उन्होंने युवाओं को व्यापक अध्ययन और सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता देने की सलाह दी। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने ऐसे संवादों को निरंतर आयोजित करने की आवश्यकता पर जोर दिया और इस आयोजन को दुमका के साहित्यिक जीवन का एक यादगार क्षण बताया।





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