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दिशोम गुरू के श्राद्धकर्म तक नेमरा में ही रहेंगे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

बाबा की स्मृतियों के साथ भावनात्मक जुड़ाव का समय बिताएंगे सीएम

झारखंड आंदोलन के प्रखर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिशोम गुरु शिबू सोरेन का मंगलवार को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने बाबा (पिता) को मुखाग्नि दी। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, गुरुजी का श्राद्धकर्म कुल 10 दिनों तक चलेगा और इस अवधि में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन नेमरा गांव में ही रहेंगे। उन्होंने श्राद्ध से जुड़ी सभी धार्मिक विधियों में पूर्ण सहभागिता करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री इस दौरान अपने परिवार के साथ समय बिताते हुए, दिवंगत पिता की स्मृतियों से जुड़ने और उन्हें आत्मिक श्रद्धांजलि देने में संलग्न रहेंगे। गौरतलब है कि दिशोम गुरु शिबू सोरेन न केवल एक राजनीतिक स्तंभ थे, बल्कि झारखंड के सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक भी रहे। उनके निधन से प्रदेश में शोक की लहर है।

जानें संथालों में क्या-क्या कर्मकांड होते हैं?

संथाल समुदाय में मृत्यु के उपरांत अधिकतर मामलों में शव का दाह संस्कार किया जाता है, लेकिन कुछ उप-समुदायों में भूमि समाधि (दफनाने) की परंपरा भी है। मुख्य संस्कार मृत्यु के दिन या अगले दिन हो जाता है। दाह संस्कार मंें लकड़ियों से चिता बनाई जाती है, और उस पर मृतक को रखा जाता है। शरीर के पास उसकी प्रिय वस्तुएँ, जैसे वस्त्र, लोहे की चीजें या पारंपरिक गहने, रखे जाते हैं। कुछ स्थानों पर मृतक के हाथ में तीर-धनुष भी रखे जाते हैं। मृत्यु के बाद मृतक के घर और परिवार को अपवित्र माना जाता है। सभी परिजनों को स्नान करना होता है, और घर में अग्नि जलाकर शुद्धिकरण किया जाता है।

10वें दिन किया जाता है भांडन भोज का आयोजन

संथालों का धार्मिक जीवन प्रकृति और आत्माओं से जुड़ा होता है, और मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए विशेष कर्मकांड किए जाते हैं। इनमें प्रमुख हैं भांडन या भांडा। यह एक विशेष अनुष्ठान है, जिसमें मृत आत्मा को विदा करने और घर में पुनः शुद्धता लाने की क्रिया होती है। यह क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार 3, 7 या 10 दिन के भीतर किया जा सकता है। परिजन सामूहिक भोज करते हैं। इसमें गांववाले, रिश्तेदार और समुदाय के बुजुर्ग शामिल होते हैं। इसमें मांसाहार, चावल की शराब (हांडिया) और नाच-गान भी होता है। यह मृत्यु को शोक नहीं, बल्कि आत्मा की विदाई का उत्सव माना जाता है। नृत्य को मृतक की आत्मा को सम्मान देने के रूप में देखा जाता है।


 
 
 

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