रोज़गार के अभाव में आदिवासी मजदूरों का पलायन तेज
- SANTHAL PARGANA KHABAR
- 4 days ago
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दुमका। मसलिया प्रखंड क्षेत्र के कई गांवों से बड़ी संख्या में आदिवासी महिला और पुरुष मजदूर रोज़गार की तलाश में पश्चिम बंगाल की ओर पलायन कर रहे हैं। गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व के दिन भी मजदूरों का गांव छोड़कर बाहर जाना क्षेत्र की गंभीर सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उजागर करता है। गांवों में काम के अवसरों की कमी के कारण मजबूर ग्रामीण परिवार पलायन को ही जीवन यापन का एकमात्र रास्ता मान रहे हैं।

बिना पंजीकरण और दस्तावेज़ के मजदूरों का पलायन
दुमका। चिंताजनक पहलू यह है कि पलायन कर रहे मजदूरों का न तो कोई सरकारी पंजीकरण हो रहा है और न ही ई-श्रम कार्ड या अन्य आवश्यक दस्तावेज़ बनाए जा रहे हैं। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर से इस मुद्दे पर ठोस निगरानी और सक्रिय हस्तक्षेप का अभाव दिखाई दे रहा है, जबकि ग्रामीण स्तर पर रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए मनरेगा सहित कई योजनाएं संचालित हैं।
सरकारी योजनाएं मौजूद, लेकिन ज़मीनी लाभ नदारद
दुमका। केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा के तहत कार्य दिवस 100 से बढ़ाकर 125 दिन किए जाने और समय पर मजदूरी भुगतान का प्रावधान है, वहीं राज्य सरकार भी मुख्यमंत्री सारथी योजना, मंईयां सम्मान योजना सहित कई योजनाओं के माध्यम से पलायन रोकने का दावा कर रही है। इसके बावजूद गांवों में रोजगार के अवसर न मिल पाने के कारण मजदूरों को बाहर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
फसल नुकसान और बेरोज़गारी ने बढ़ाई मजबूरी
दुमका। पलायन कर रहे मजदूरों ने बताया कि इस वर्ष धान की फसल में कीट प्रकोप से भारी नुकसान हुआ है और गांव में फिलहाल कोई काम उपलब्ध नहीं है। पश्चिम बंगाल में धान रोपनी के लिए उन्हें 250 रुपये प्रतिदिन मजदूरी और आने-जाने के लिए 500 रुपये तय किए गए हैं। श्रम विभाग के अनुसार लिखित शिकायत मिलने पर कार्रवाई की जाएगी, साथ ही मजदूर पंजीकरण और जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि रोजगार के अभाव में ग्रामीणों का पलायन लगातार बढ़ता जा रहा है।








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