नहीं रहे झारखण्ड के प्रख्यात इतिहासकार डॉ0 सुरेन्द्र झा
- SANTHAL PARGANA KHABAR
- Sep 1, 2025
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दुमका के रसिकपुर मोहल्ले में स्थित घर में ली अंतिम सांस
दुमका। 01 सितम्बर के सुबह जब घड़ी में दो-ढाई बज रहे थे कि इसी समय झारखण्ड के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ0 सुरेन्द्र झा का दुमका के रसिकपुर मुहल्ला स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। यह जानकारी उनके पुत्र प्रणव झा से दूरभाष पर मिली। उनका शव अंतिम संस्कार के लिए शाम 5 बजे के बाद ले जाया जायेगा। डॉ0 झा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च सोसायटी, कोलकाता के एक्जेक्यूटिव मेम्बर थे। वह दूसरी बार इस पद के लिये निर्वाचित हुए थे। वह सिदो कान्हु मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका के स्नातकोत्तर इतिहास विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए थे। दुमका के संताल परगना महाविद्यालय में भी प्राचार्य रह चुके थे। झारखण्ड के इस विख्यात इतिहासकार को संथाल परगना खबर परिवार भावभीनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करता है

इतिहास जगत् में एक बड़ा सूनापन आ गया: वाजपेयी
दुमका के पुरातत्ववेत्ता अनूप कुमार वाजपेयी इस खबर को सुनकर हतप्रभ हैं। उन्होंने बताया, ‘‘अचानक इस दुःखद खबर से मैं अवाक रह गया। घंटों इतिहास पर मेरी उनसे चरचा होती थी। अब मैं इस गम्भीर विषय पर चरचा किससे करूँगा?- यह चिन्ता मुझे सताने लगी है और शायद आगे भी सताती रहेगी। इतिहास जगत् में एक बड़ा सूनापन आ गया।’’

मैट्रिक से एमए तक सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की
बिहार के बांका जिला के ग्राम राजपुर, बेलहर में जनवरी 1953 में जन्मे डॉ० सुरेंद्र झा ने मैट्रिक से लेकर एमए तक की सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं। भागलपुर विश्वविद्यालय (पुराने) के 1970 के बीए (प्रीवियस) के सफल छात्रों की सूची में इनका स्थान सबसे ऊपर था। एमए (इतिहास) में इन्होंने प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया। (1972-74 सत्र) में अपना पीएचडी उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय से ही पूरा किया। अब तक इनके मार्गदर्शन में अनेक छात्र पीएचडी की उपाधि ग्रहण कर चुके हैं। मानक शोध पत्रिकाओं में इनके कई आलेख प्रकाशित हैं।

देश के बड़े इतिहासकारों में लिया जाता है नाम, कई पुस्तकों का किया प्रकाशन
डॉ० सुरेंद्र झा ने संताल परगना महाविद्यालय, दुमका (झारखंड) में 1976 से शिक्षण कार्य आरम्भ किया था। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह लगातार अध्ययन और पुस्तक लेखन में लगे हुए थे। प्रकाशित उनकी निम्नलिखित प्रमुख पुस्तकें हैं-
(1) रीडिंग्स इन रिजनल हिस्ट्री ऑफ बिहार एंड झारखंड-द सरकार आफ मुंगेर (1556-1765), जानकी प्रकाशन, पटना 2004
(2) द कोलोनियल इकोनॉमी आफ जंगल-तराई -संताल परगना (1793-1947), जानकी प्रकाशन, पटना, 2006.
(3) सिचुएटिंग दि ट्राइबल्स इन इण्डिया (प्रो० (डॉ०) चित्तव्रत पालित के साथ संयुक्त रूप से सम्पादित), बीआर पब्लिशिंग कारपोरेशन, अशोक विहार, नई दिल्ली, 2009
(4) सिन्थीसिस ऑफ बुद्धिस्ट शैव एण्ड शाक्त तंत्राज, प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली, 2009
(5) दि हिस्ट्री ऑफ दि संताल ऑफ जंगल तराई (1800-1855), आयुष्मान प्रकाशन, नई दिल्ली, 2015
(6) बौद्ध शैव और शाक्त-तन्त्र (समन्वयात्मक संश्लेषण) - एक अनजान सिद्धपीठ मलूटी
प्रतिभा प्रकाशन, 7259/23 अजेन्द्र मार्केट, प्रेमनगर, शक्तिनगर, दिल्ली - 110007
(7) पोलिटिकल एन्ड इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ जंगल तराई संताल परगनाज, 1565-1947, प्रकाशक: रिसर्च इंडिया प्रेस दिल्ली, 2025




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