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गुड न्यूज : सरकारी सिस्टम से निराश होकर ग्रामीणों ने खुद से बना डाली सड़क

शिकारीपाड़ा प्रखंड के दूधाजोल गांव में मुखिया, ग्राम प्रधान के साथ ग्रामीणों ने किया श्रमदान

दुमका। दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के जामुगड़िया पंचायत के दूधाजोल गांव के ग्रामीणों ने सरकारी तंत्र की लापरवाही से तंग आकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। दूधाजोल के ग्रामीणों ने साबित कर दिया कि इच्छाशक्ति और एकजुटता से कोई भी काम असंभव नहीं होता है। भले ही सिस्टम साथ न दे, लेकिन संकल्प से राह निकल ही आती है। वर्षों से सड़क निर्माण की मांग अनसुनी रहने के बाद ग्रामीणों ने रविवार को अपने दम पर सड़क बनाने की शुरुआत की। करीब 04 किलोमीटर लंबी इस सड़क को बनाने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटे। सड़क निर्माण कार्य में गांव के ग्राम प्रधान जीतू टुडू और पंचायत के मुखिया गेब्रियल मरांडी भी ग्रामीणों के साथ श्रमदान करते नजर आए। सड़क निर्माण को लेकर ग्रामीणों में गजब का उत्साह और उमंग देखा गया। सभी को यह खुशी थी कि अब उन्हें आवागमन की परेशानी से जल्द निजात मिलने वाली है।

वर्षों से अधूरी रही सड़क, प्रशासन ने नहीं दिया ध्यान

दुमका। दूधाजोल गांव से शिकारीपाड़ा प्रखंड मुख्यालय की दूरी लगभग पाँच किलोमीटर है, जिसमें चार किलोमीटर का हिस्सा अब तक सड़क विहीन रहा। यह रास्ता पूरी तरह पथरीला और गड्ढों से भरा हुआ था। ऐसे में वाहनों का आना-जाना तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो गया था। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार पूर्व विधायक और वर्तमान सांसद नलिन सोरेन, वर्तमान विधायक आलोक सोरेन और जिला प्रशासन से गुहार लगाई, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

गर्भवती महिलाएं और छात्र सबसे ज्यादा परेशान

ग्रामीणों ने बताया कि सड़क की दुर्दशा के कारण आपात स्थिति में एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती। गर्भवती महिलाओं और मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाना बेहद कठिन हो जाता है। वहीं, बच्चे भी समय पर स्कूल नहीं जा पाते और आए दिन लोग इस जर्जर सड़क पर दुर्घटना के शिकार होते हैं।

75 साल बाद भी नहीं मिली सड़क: मुखिया गेब्रियल मरांडी

मुखिया गेब्रियल मरांडी ने कहा, “अंग्रेजों के जमाने से लेकर आजादी के 75 साल बीत गए, लेकिन हमें अब तक एक अच्छी सड़क नसीब नहीं हुई। इसलिए हमने ठान लिया कि अब सरकार के भरोसे नहीं बैठेंगे, खुद अपने दम पर सड़क बनाएंगे।” उन्होंने बताया कि सड़क निर्माण के लिए किसी बाहरी संस्था या सरकारी सहायता नहीं ली गई है। ग्रामीण खुद श्रमदान कर सड़क तैयार कर रहे हैं। हालांकि यह सड़क अभी कच्ची है, क्योंकि ग्रामीण आस-पास की मिट्टी काटकर इसे समतल बना रहे हैं।

कच्ची सड़क को पक्की सड़क में बदले सरकार व प्रशासन

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि अब जबकि उन्होंने खुद पहल कर कच्ची सड़क बना ली है, तो प्रशासन आगे बढ़कर इसे पक्की सड़क में तब्दील करे, ताकि उनके दशकों पुराने सपने को स्थायी रूप मिल सके।


 
 
 

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